गुजरात में दिखेगा केजरीवाल का करिश्मा?

दिल्ली में ऐतिहासिक जीत के बाद आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब गोवा, पंजाब और गुजरात की ओर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.

अगर समय पर हों तो दिसंबर 2017 में गुजरात के चुनाव होने वाले हैं. मगर ये भी कहा जा रहा है कि ये चुनाव अप्रैल 2017 में भी हो सकते हैं.

अब देखना यह है कि इस चुनाव में कौन जीतता है क्योंकि नरेंद्र मोदी के दिल्ली जाने के बाद भाजपा पहली दफा मोदी नेतृत्व के बिना चुनाव लड़ेगी.

गुजरात भाजपा का मॉडल राज्य है. जो गुजरात में बीजेपी के साथ होता है वो अन्य राज्यों में रिपीट होता है. इसलिए बीजेपी के लिए गुजरात एक बहुत महत्व का राज्य ही नहीं, बल्कि आदर्श प्रारूप (आइडियल टाइप) है.

कहते हैं जब गुजरात भाजपा को छींक आती है तो पूरे भारत में भाजपा को जुकाम हो जाता है. इसलिए गुजरात विधान सभा का आने वाला चुनाव बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

गुजरात में भाजपा का शासन साल 1994 से चल रहा है. इस दौरान केशुभाई, सुरेशभाई, नरेन्द्र मोदी, आनंदीबेन और अब विजय रूपाणी मुख्यमंत्री हैं.

मोदी के दिल्ली जाने के बाद आनंदीबेन के समय में पाटीदार आंदोलन, दलित आंदोलन और पिछड़ों के आंदोलन हुए.

स्थानीय इकाइयों के चुनावों में 33 ज़िलों में कांग्रेस का शासन आया. सरकार के प्रति किसानों का विरोध बढ़ा.

यह सब चीजें इंगित कर रही हैं कि गुजरात में 22 साल के शासन के बाद एंटी इनकंबेंसी है. भाजपा मंत्रियों की बैठकों में लोग सीधा विरोध करते हैं.

सूरत की सभा में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री विजय रूपाणी को विरोध होने की वजह से मीटिंग बीच में ही छोड़ देनी पड़ी.

इंटेलिजेंस ब्यूरो ने जो सर्वे किया है उसके मुताबिक़ आगामी चुनाव में भाजपा को 70 सीटें मिलने का अनुमान है.

वहीं राज्य में जहां तक कांग्रेस का हाल है, तो पार्टी पांच खेमों में बंटी हुई है, एकजुट नहीं है. कई वर्षों तक सत्ता से बाहर रहने से उसका संगठन छिन्न-भिन्न हो गया है.

बूथ मैनेज करने के लिया कांग्रेस के पास कार्यकर्ता नहीं है. यह देखते हुए कांग्रेस को 80 से ज़्यादा सीटें नहीं आ सकती.

इस स्थिति में एनसीपी (शरद पवार), बीएसपी (मायावती) और आम आदमी पार्टी गुजरात में अपनी स्थिति मज़बूत करने की कोशिश कर रही है.

इस स्थिति में अन्य दो की तुलना में आम आदमी पार्टी की स्थिति थोड़ी मज़बूत लग रही है. ऊना के छोटे कस्बे के एक गांव में दलितों पर अत्याचार हुए और उसके बाद आंदोलन चल पड़ा तब केजरीवाल गुजरात आए थे.

तब उन्हें लोगों का काफ़ी समर्थन मिला था. यह देखते हुए ही उन्होंने अपना मन बनाया है कि आम आदमी पार्टी गुजरात का अगला चुनाव लड़ेगी. अलबत्ता, गुजरात में उनकी पार्टी का संगठन मज़बूत नहीं है.

मगर केजरीवाल के करिश्मे से कुछ फर्क पड़ सकता है. आंदोलित पाटीदार, दलित और अन्य पिछड़े भाजपा से दूर चले गए हैं, मगर कांग्रेस की ओर नहीं आए हैं. इस स्थिति में आम आदमी पार्टी के लिए कुछ उम्मीद बनती है.

केजरीवाल इन दिनों तीन दिवसीय दौरे के तहत गुजरात में हैं. पहले दिन वे उत्तर गुजरात गए जो पाटीदार आंदोलन का केंद्र है, वे पाटीदार नेताओं के साथ वहां काम कर रहे स्वयंसेवी संस्थाओं से मिले हैं.

16 अक्टूबर को उनका कार्यक्रम उसी सूरत शहर में हुआ जहां अमित शाह और विजय रूपाणी को हाल ही में अपना कार्यक्रम बीच में छोड़ना पड़ा था.

17 अक्टूबर को केजरीवाल पार्टी नेता और कार्यकर्ताओं से भेंट करेंगे और आगामी चुनाव रणनीति की चर्चा करेंगे. बावजूद इसके मौजूदा स्थिति में आम आदमी पार्टी को 25 से ज़्यादा सीटों के आने का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि राज्य में पार्टी का संगठन ही अब तक नहीं बन पाया है.

राज्य में आम आदमी पार्टी के पास काम करने वाले आम लोग तो हैं लेकिन नेतृत्व का अभाव है. केजरीवाल को किसी युवा नेता को आगे लाना होगा. देखना है कि केजरीवाल क्या रणनीति अपनाते हैं?

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी को आम आदमी पार्टी का डर भी लग गया है. सूरत में आम आदमी पार्टी को सभा करने की अनुमति नहीं मिली थी, जिसके चलते उन्हें कोर्ट से परमिशन लेनी पड़ी. भाजपा कार्यकर्ता केजरीवाल के ख़िलाफ़ सोशल प्लेटफॉर्म पर अभियान भी चला रहे हैं.

लेकिन दूसरी ओर गुजरात के युवा केजरीवाल से ख़ासे प्रभावित हैं. जो करिश्मा मोदी में हैं, वो ही करिश्मा जरा अलग तरह से केजरीवाल में भी है. अब देखना है कि उनका करिश्मा आम आदमी पार्टी को चुनाव जीता सकता है या नहीं?

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