देश में 17 महीने के उछ स्तर पर पहुंचा CPI, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिया ये बड़ा बयान

CPI at 17 Month High: देश में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई (CPI) 17 महीने के उछ स्तर पर पहुंच गया है. दूसरी तरफ वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने यह कहा है कि भारत में मुद्रास्फीति ने मुद्रास्फीति लक्ष्य को इतनी बुरी तरह से पार नहीं किया है. वित्त मंत्री ने कहा है कि देश इस समय भू-राजनीतिक संघर्ष और आपूर्ति श्रृंखला व्यवधान जैसी वैश्विक चुनौतियों के बीच कीमतों में बढ़ोतरी से जूझ रहा है. केंद्रीय वित्त मंत्री ने वाशिंगटन डीसी में एक कार्यक्रम के दौरान ये बातें कही. 

वित्त मंत्री ने कही ये बात

वित्त मंत्री ने आगे कहा कि इसके लिए कई वैश्विक चुनौतियां हैं, चाहे कच्चे तेल की कीमत हो या अन्य वस्तुओं की कीमतें हों जो आसमान छू रही हों. इन बढ़ती महंगाई का सभी अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ेगा. केंद्रीय वित्त मंत्री ने कहा कि भारत की मुद्रास्फीति 6.9% है. हमारा टॉलरेंस बैंड केवल 4%, प्लस या माइनस 2% है, तो हम 6% तक जा सकते हैं. हमने 6% को पार किया है, यानी मुद्रास्फीति अपने लक्ष्य से बहुत ज्यादा नहीं भटका है. 

NSO का आंकड़ा क्या कहता है?

वित्त मंत्री ने बताया, ‘राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के आंकड़ों से पता चलता है कि मार्च में हेडलाइन सीपीआई बढ़कर 17 महीने के उच्च स्तर 6.95% पर पहुंच गया, जो फरवरी में 6.07% था. खुदरा मुद्रास्फीति अब लगातार तीन महीनों के लिए मौद्रिक नीति समिति (MPC) के मुद्रास्फीति लक्ष्य से अधिक हो गई है. वित्त वर्ष 2012 में खुदरा मुद्रास्फीति का औसत वार्षिक रूप से 5.5% था और यह लगातार दूसरे वर्ष एमपीसी के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ज्यादा रहा है. 

थोक मूल्य मुद्रास्फीति चार महीने के उच्च स्तर पर 

वित्त मंत्री ने बताया, ‘ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्य मूल्य मुद्रास्फीति मार्च 2021 में 3.94% से बढ़कर मार्च 2022 में 8.04% पर पहुंच गई है. आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों के साथ-साथ रूस-यूक्रेन के बीच भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण कमोडिटी की कीमतें कई साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं.’ हाल ही में, थोक मूल्य मुद्रास्फीति मार्च में चार महीने के उच्च स्तर 14.55% पर आ गई, जिससे दोहरे अंकों वाले क्षेत्र में एक वर्ष पूरा हो गया. उच्च WPI मुद्रास्फीति को उच्च उपभोक्ता कीमतों को बढ़ाने में अहम भूमिका के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है, क्योंकि निर्माता बढ़ती लागत ग्राहकों पर डालते हैं.’