
पूर्वी सिंहभूम जिले में पिछले दो दशकों से शांति का जो दौर था, उसे 13 जनवरी 2026 की घटना ने झकझोर कर रख दिया। युवा उद्यमी कैरव गांधी के अपहरण ने शहर की कानून-व्यवस्था को आईना दिखाया और पुराने जख्मों को ताजा कर दिया।
हालांकि, 14 दिनों के बाद कैरव सुरक्षित घर लौट आए हैं, लेकिन यह मामला पुलिस के लिए जितनी बड़ी राहत है, उतनी ही बड़ी चुनौती भी।
इतिहास के पन्नों में अपहरण का दौर
जमशेदपुर और आसपास के क्षेत्रों में उद्यमियों का अपहरण एक समय बड़ी समस्या थी, लेकिन पिछले 20 वर्षों में ऐसी वारदातें लगभग नगण्य हो गई थीं। कैरव गांधी मामले ने शहरवासियों को उन पुराने मामलों की याद दिला दी:
अजय सिंह (2004): राहरगोड़ा के उद्यमी अजय सिंह का अपहरण हुआ और 30 दिनों बाद उनकी बरामदगी हुई।
विश्वनाथ गर्ग (2004): चांडिल से अपहरण के बाद पटना से सुरक्षित बरामद किए गए।
कृष्णा भालोटिया (2006): इस केस में बिहार के कुख्यात गिरोह का हाथ था और एक अपराधी मुठभेड़ में मारा गया था।
कैरव गांधी केस: पहली बार अपराधी ‘अदृश्य’
पूर्वी सिंहभूम जिले के आपराधिक इतिहास में यह संभवतः पहला ऐसा हाई-प्रोफाइल मामला है, जहां अपहरण की पुष्टि हुई। 5 करोड़ की फिरौती मांगी गई, लेकिन अपहृत की वापसी के बावजूद अब तक एक भी अपराधी सलाखों के पीछे नहीं पहुंचा है।
यह पुलिस की कार्यशैली पर दोहरे सवाल खड़े करता है। क्या यह पुलिस की कोई गुप्त रणनीति थी या अपराधियों ने सुरक्षित ‘एग्जिट रूट’ तलाश लिया?
रणनीतिक धैर्य बनाम अपराधियों की चाल
जब 13 जनवरी को कैरव लापता हुए, तो पूरे शहर में असुरक्षा का माहैाल बन गया। पुलिस-प्रशासन पर भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव था।
विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस ने इस मामले में वेट एंड वॉच की नीति अपनाई। किसी भी जल्दबाजी वाली कार्रवाई से कैरव की जान जोखिम में पड़ सकती थी।
तकनीकी निगरानी और मनोवैज्ञानिक दबाव के कारण कैरव की सकुशल वापसी हुई, लेकिन मुख्य सवाल अब भी बरकरार हैं कि अपहरण किस गिरोह ने किया? अपहर्ताओं ने आखिरकार 14 दिनों तक उन्हें किन ठिकानों पर रखा? क्या बिना किसी लेनदेन के अपराधी उन्हें छोड़ने पर राजी हुए? ये सारे सवाल मौजूं है।
संगठित अपराध का खतरा फिर से मंडराने लगा
औद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ संगठित अपराध का खतरा फिर से मंडराने लगा है। कैरव गांधी की सुरक्षित वापसी ने एक बड़ी अनहोनी तो टाल दी है, लेकिन यह घटना प्रशासन और समाज के लिए गंभीर संदेश है।
सुरक्षा व्यवस्था में छोटी सी चूक फिर से पुराने काले दिनों को वापस ला सकती है। फिलहाल शहर की निगाहें पुलिस की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।





