कांग्रेस ने निजी लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों को बेचा, पॉल एम मैकगेरकी की किताब के हवाले से कई दावे

किताब में दावा किया गया है कि 1957 में जब चीन–भारत संबंधों में तनाव बढ़ा, तब आईबी ने नेहरू को बीजिंग में राजनयिक आवरण के तहत एक खुफिया अधिकारी तैनात करने के लिए राजी किया। इस फैसले में विदेश मंत्रालय और चीन में भारत के राजदूत आरके नेहरू की आपत्तियों को भी दरकिनार किया गया।
पूर्व सेनाध्यक्ष एमएम नरवणे की किताब को लेकर जारी सियासत के बीच दक्षिण एशिया में शीतयुद्ध काल में जासूसी गतिविधियों पर आधारित एक नई किताब में भारतीय राजनीति को लेकर कई चौंकाने वाले दावे किए गए हैं। इस किताब के सामने आने से कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
किताब में दावा किया गया है कि केरल और बंगाल में कम्युनिस्टों की सरकार को रोकने की कोशिश की गई और इसके लिए कांग्रेस को पैसा दिया गया। किताब के हवाले से दावा किया गया है कि कांग्रेस और उसका इतिहास निजी लाभ के लिए राष्ट्रीय हितों को बेचने का रहा है।
लेखक पॉल एम. मैकगैर ने अपनी पुस्तक स्पाइंग इन साउथ एशिया : ब्रिटेन, द यूनाइटेड स्टेट्स एंड इंडियाज सीक्रेट कोल्ड वार में कहा है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने भारत में राजनीतिक घटनाक्रमों को प्रभावित करने का प्रयास किया था। मैकगेर के अनुसार, मोयनिहैन ने अपनी 1978 में प्रकाशित पुस्तक अ डेंजर्स प्लेस में लिखा है कि सीआईए ने केरल और पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकारों के गठन को रोकने के मकसद से तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को धन उपलब्ध कराया था।
एक वाकये का जिक्र करते हुए मोयनिहैन के हवाले से यह भी दावा किया गया कि उस समय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष रहीं इंदिरा गांधी को यह पैसा सीधे दिया गया था। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के नियुक्त राजदूत मोयनिहैन के अनुसार, इंदिरा को संयुक्त राज्य अमेरिका समेत विदेशी खुफिया एजेंसियों के साथ सहयोग करने में तब कोई खास आपत्ति नहीं थी, जब ऐसा करना उनके हित में होता था।
कठिन शर्तों ने बनाई डगर मुश्किल
1957 में जब चीन–भारत संबंधों में तनाव बढ़ा, तब आईबी ने नेहरू को बीजिंग में राजनयिक आवरण के तहत एक खुफिया अधिकारी तैनात करने के लिए राजी किया। इस फैसले में विदेश मंत्रालय और चीन में भारत के राजदूत आरके नेहरू की आपत्तियों को भी दरकिनार किया गया। नेहरू ने स्पष्ट निर्देश दिए कि भेजा जाने वाला अधिकारी चीनी भाषा में दक्ष हो, प्रशिक्षित अर्थशास्त्री हो और उसे राजनीतिक मामलों की समझ भी हो। नेहरू का तर्क था कि केवल खुफिया प्रशिक्षण किसी विदेशी हालात का आकलन करने के लिए पर्याप्त नहीं है। मगर मानक इतने ऊंचे रखे गए कि शंघाई में दूसरा अधिकारी भेजने की योजना उपयुक्त कर्मियों के अभाव में रद्द करनी पड़ी। 1959 तक आते–आते जब दोनों देशों के बीच तनातनी और बढ़ी, तो एक भारतीय अकादमिक और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य ने खुफिया व प्रचार संगठन की कमजोरी पर खुलकर चिंता जताई।
अनजान नहीं थीं इंदिरा
किताब में कहा गया है कि 1964 के बाद कैबिनेट मंत्री बनीं इंदिरा गांधी के बारे में यह मानना कठिन है कि वह भारतीय सरकार की सहमति से चल रही इन कथित गतिविधियों से अनजान रही हों। किताब के अनुसार, वर्ष 1975 में यह मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया था, जब सीआईए की कथित विध्वंसक गतिविधियों के खिलाफ चल रहे अभियान के बीच हिंदुस्तान टाइम्स ने इस विषय पर रिपोर्टें प्रकाशित की थीं। हालांकि लेखक ने यह भी साफ किया है कि ये दावे ऐतिहासिक दस्तावेज और संस्मरणों पर आधारित हैं, जिन पर अलग-अलग टिप्पणियां संभव हैं।
खुफिया नेटवर्क विस्तार को लेकर संशय में थे नेहरू
पाकिस्तान में भारतीय राजनयिक मिशनों व कुछ यूरोपीय राजधानियों में अधिकारियों की नियुक्ति की गई। इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को बढ़ाने की योजनाएं जुलाई 1950 में संजीवी को डीआईबी (निदेशक, आईबी) पद से हटाए जाने के कारण प्रभावित हुईं। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस बात को लेकर संशय में थे कि भारत को खुफिया नेटवर्क का व्यापक विस्तार करने की आवश्यकता है या वह ऐसा कर भी सकता है।
चीनी मामलों पर पकड़ थी कमजोर
चीन जैसे बंद देशों से भरोसेमंद और समय पर जानकारी जुटाना भारत के लिए बड़ी चुनौती बन गया था। चीन के पास ऐसे खुफिया तंत्र थे जो आकार और संसाधनों में आईबी से कहीं अधिक मजबूत थे। उस दौर में चीनी मामलों पर भारतीय खुफिया एजेंसी आईबी की पकड़ कमजोर थी। संरचनात्मक दिक्कतें, सांस्कृतिक बाधाएं और वित्तीय सीमाएं इसकी बड़ी वजह रहीं। स्थिति इतनी गंभीर थी कि 1950 के मध्य तक पूरे देश में मुश्किल से आधा दर्जन ऐसे लोग थे जो चीनी भाषा पढ़–लिख सकते थे। दिसंबर 1954 में लंदन की एक पहल को मंजूरी दी गई, लेकिन भारतीय काउंसलर के तबादले के बाद यह योजना भी ठंडे बस्ते में चली गई।





