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कालका-शिमला ट्रैक पर सफर हुआ सुरक्षित, डिब्बों में लगाए गए एयर ब्रेक

यूनेस्को विश्व धरोहर कालका-शिमला रेलवे सेक्शन पर शुक्रवार को नई सुरक्षा तकनीक का इस्तेमाल किया गया। उत्तर रेलवे ने इस ट्रैक पर स्वदेशी तकनीक से विकसित एयर ब्रेक सिस्टम वाले नैरो गेज कोचों के पहले रेक को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस तकनीक से अब पहाड़ों की रानी शिमला का सफर न केवल रोमांचक हो जाएगा, बल्कि आधुनिक तकनीक के कारण सफर पहले से कहीं अधिक सुरक्षित भी होगा। उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक अशोक कुमार वर्मा ने बताया कि उनका लक्ष्य विरासत को संजोने के साथ यात्रियों को 21वीं सदी की सुरक्षा सुविधाएं देना है। यह एयर ब्रेक सिस्टम इसी दिशा में एक बड़ा कदम है।

सुबह 6:20 पर शुरू हुआ संचालन

शुक्रवार सुबह ठीक 6:20 बजे जब गाड़ी संख्या 52453 कालका-शिमला एक्सप्रेस कालका स्टेशन से रवाना हुई, तो यह सिर्फ एक ट्रेन की रवानगी नहीं थी, बल्कि विरासत और आधुनिकता के मिलन का आगाज था। 7 कोचों वाले इस रेक को शक्तिशाली लोको नंबर 714 जैडडीएम3डी खींच रहा था। कालका वर्कशॉप में तैयार किए गए इन कोचों ने अपनी पहली यात्रा सफलतापूर्वक पूरी की।

खास है यह नई तकनीक

अब तक इन छोटी लाइनों पर पुराने वैक्यूम ब्रेक का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब इनकी जगह स्वदेशी एयर ब्रेक सिस्टम ने ले ली है। इससे हिमालय की खड़ी ढलानों और तीखे मोड़ों पर ट्रेन को नियंत्रित करना अब आसान होगा। ट्रेन की बोगियों और ट्रॉलियों को कड़े सुरक्षा मानकों के तहत अपग्रेड किया गया है। इस पूरे सिस्टम को स्थानीय स्तर पर डिजाइन और विकसित किया गया है।

परीक्षण के बाद मिली हरी झंडी

इन नए कोचों को पटरी पर उतारने से पहले रेलवे ने कई परीक्षण किए। अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) द्वारा इनका इमरजेंसी ब्रेकिंग डिस्टेंस (ईबीडी) और ऑसिलेशन ट्रायल किया गया। इसके बाद रेलवे सुरक्षा आयुक्त (सीआरएस) की हरी झंडी और महाप्रबंधक की अंतिम मंजूरी के बाद ही इसे यात्री सेवा में शामिल किया गया।

पर्यटकों के लिए तोहफा
कालका-शिमला मार्ग पर बनी 103 सुरंगों और पुलों का नजारा देखने वाले दुनिया भर के पर्यटकों के लिए यह आधुनिकीकरण किसी तोहफे से कम नहीं है। रेलवे का यह प्रयास सुनिश्चित करता है कि इस ट्रैक का पुराना रोमांच बरकरार रहे, लेकिन सफर में सुरक्षा का भरोसा बिल्कुल नया हो। -विनोद भाटिया, डीआरएम, अंबाला।

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