द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी पर इस विधि से करें पूजा, जानें बप्पा का प्रिय भोग और फूल

हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। आज 5 फरवरी 2026 को यह पावन व्रत रखा जा रहा है। संकष्टी का अर्थ होता है संकटों को हरने वाली। ऐसी मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस दिन सच्चे मन से भगवान गणेश की पूजा करता है, बप्पा उसके जीवन के सभी विघ्नों को दूर कर देते हैं। आइए जानते हैं द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि, भगवान के प्रिय भोग, फूल और प्रमुख बातें।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का महत्व
भगवान गणेश के 32 रूपों में से छठा रूप द्विजप्रिय गणेश का है। द्विज का मतलब होता है, जो दो बार जन्म ले और शास्त्रों का ज्ञाता हो। बप्पा के इस रूप में चार मस्तक और चार भुजाएं हैं। इनकी पूजा करने से जातक को आरोग्य, लंबी उम्र और तेज बुद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही जीवन में शुभता आती है।
पूजा विधि
सुबह स्नान के बाद लाल या पीले वस्त्र धारण करे।
हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
एक वेदी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें।
उन्हें गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।
बप्पा को सिंदूर का तिलक लगाएं।
इसके बाद उन्हें अक्षत, फूल, मोदक, धूप और दीप अर्पित करें।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी कथा का पाठ करें।
अंत में आरती करें।
एक लोटे में दूध, जल और अक्षत मिलाकर चंद्रमा को अर्घ्य दें, क्योंकि इसके बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है।
पूजा में हुई सभी गलती के लिए माफी मांगे।
गणेश जी के प्रिय फूल – गणेश जी को लाल रंग के फूल बहुत प्रिय हैं, विशेषकर गुड़हल का फूल। इसके अलावा उन्हें दूर्वा चढ़ाना भी बहुत शुभ माना गया है।
बप्पा का प्रिय भोग – बप्पा को मोदक बहुत प्रिय हैं। इसके अलावा आप उन्हें बेसन या मोतीचूर के लड्डू का भोग भी लगा सकते हैं। इस दिन चने की दाल और गुड़ का भोग लगाना भी बहुत फलदायी माना जाता है।
पूजा मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
ॐ द्विजप्रियाय नमः
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
इन बातों का रखें ध्यान
गणेश जी की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्तों का प्रयोग न करें, क्योंकि गणेश जी की पूजा में तुलसी वर्जित मानी गई है। साथ ही इस दिन किसी का अनादर न करें और मन में सात्विक विचार रखें।





