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हरियाणा में बदलने लगा मौसम, तामपान चढ़ने से गर्मी की आहट

हरियाणा में मौसम तेजी से बदल रहा है। दिन के तापमान में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है और लोगों को हल्की गर्मी का अहसास होने लगा है। शनिवार को कई जिलों में अधिकतम तापमान 24 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा, जबकि न्यूनतम तापमान 8 से 12 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

मौसम के इस उतार-चढ़ाव ने जहां गर्मी की आहट दे दी है, वहीं गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के खतरे को भी बढ़ा दिया है। मौसम विज्ञानी डॉ. चंद्र मोहन के अनुसार 15 फरवरी के बाद मौसम आमतौर पर शुष्क रहने का अनुमान है, जबकि 17 फरवरी को पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय होने से वर्षा की संभावना है।

मौसम के बदलते मिजाज ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। वातावरण में नमी बनी हुई है, जो गेहूं की फसल में पीला रतुआ रोग के लिए अनुकूल है। यमुनानगर जिले में करीब 90 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की फसल खड़ी है और विभाग संवेदनशील क्षेत्रों में निगरानी कर रहा है।

कृषि विभाग के अनुसार नदियों और नहरों के आसपास के क्षेत्र अधिक संवेदनशील हैं, जहां नमी ज्यादा रहती है। साढौरा, बिलासपुर, खिजराबाद और रादौर जैसे हिमाचल सीमा से सटे क्षेत्र पीला रतुआ के लिहाज से उच्च जोखिम वाले माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह फंगस जनित रोग 15 जनवरी से 15 मार्च के बीच तेजी से फैल सकता है।

विशेषज्ञ टीम 10 फरवरी को करेगी निरीक्षण
केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत वनस्पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय की टीम पहले ही फसलों का सर्वे कर चुकी है। अब भारतीय गेहूं और जौ अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञ 10 फरवरी को खेतों का निरीक्षण कर सकते हैं, ताकि पीला रतुआ के शुरुआती लक्षण मिलने पर समय रहते नियंत्रण उपाय किए जा सकें।

पत्तियों पर दिखते हैं शुरुआती लक्षण
पीला रतुआ के शुरुआती लक्षण गेहूं की पत्तियों पर पीले रंग के पाउडरनुमा धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं। रोग बढ़ने पर पत्तियां सूखने लगती हैं और पौधे का विकास रुक जाता है, जिससे उत्पादन प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार पत्तियों में हल्का पीलापन पोषक तत्वों की कमी से भी हो सकता है, ऐसी स्थिति में किसान जिंक और यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं।

किसानों को नियमित निगरानी की सलाह
अतिरिक्त पौधा संरक्षण अधिकारी डॉ. सतीश कुमार ने बताया कि मौजूदा तापमान पीला रतुआ के लिए अनुकूल है। किसानों को नियमित रूप से फसलों की निगरानी करनी चाहिए। यदि रोग के लक्षण दिखाई दें तो प्रभावित पौधों को नष्ट कर दें और आवश्यकता पड़ने पर प्रोपीकोनाजोल या टैबूकोनाजोल का छिड़काव करें।

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