
ओडिशा में जेलों की सुरक्षा व्यवस्था को अब अत्याधुनिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के हवाले कर दिया गया है। जेल की चहारदीवारी के भीतर प्रतिबंधित सामग्री (कॉन्ट्राबैंड) की तस्करी रोकने और कैदियों के भागने की कोशिशों को नाकाम करने के लिए राज्य सरकार ने एआइ-संचालित सर्विलांस सिस्टम को हरी झंडी दे दी है। यह कदम जेल प्रशासन को मैन्युअल निगरानी की सीमाओं से ऊपर उठाकर पूरी तरह डिजिटल सुरक्षा चक्र में तब्दील कर देगा।
ढेंकानाल जेल में मिली सफलता के बाद विस्तार
परियोजना की शुरुआत एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में ढेंकानाल जिला जेल से हुई थी। परीक्षण के दौरान यह देखा गया कि एआइ कैमरे न केवल इंसानी हरकतों को पहचानते हैं, बल्कि दीवारों के ऊपर से फेंकी गई छोटी से छोटी वस्तु (जैसे मोबाइल या ड्रग्स की पुड़िया) को भी मिलीसेकंड में ट्रैक कर लेते हैं। इसी सफलता के आधार पर अब जेल निदेशालय ने इसे राज्यव्यापी स्तर पर लागू करने का निर्णय लिया है।
सुरक्षा का अभेद्य चक्र: दो चरणों में कार्यान्वयन
डीआईजी (जेल) बिरेन साहू के अनुसार, इस पूरे प्रोजेक्ट को दो महत्वपूर्ण चरणों में विभाजित किया गया है:
प्रथम चरण: इसके तहत राज्य की 18 महत्वपूर्ण जेलों को चुना गया है। सुरक्षा की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रत्येक जेल परिसर में 16 एआइ कैमरा यूनिट्स स्थापित की जा रही हैं।
द्वितीय चरण (सर्कल जेलों पर फोकस): अगले चरण में राज्य की चार सबसे बड़ी सर्कल जेलों— झारपाड़ा (भुवनेश्वर), चौद्वार, संबलपुर और बरहमपुर को कवर किया जाएगा। इन जेलों में खूंखार अपराधियों की मौजूदगी को देखते हुए यहाँ कैमरों की संख्या दोगुनी (32 कैमरे प्रति जेल) रखी गई है, ताकि 360 डिग्री निगरानी सुनिश्चित हो सके।
वर्चुअल फेंसिंग: आधुनिक तकनीक का कमाल
यह सिस्टम साधारण सीसीटीवी से कई गुना अधिक स्मार्ट है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता ‘वर्चुअल फेंसिंग’ है।
अलर्ट सिस्टम: जेल के भीतर कुछ संवेदनशील जोन निर्धारित किए गए हैं, जहाँ एक काल्पनिक रेखा (वर्चुअल लाइन) बनाई गई है। यदि कोई कैदी या अनाधिकृत व्यक्ति उस रेखा को छूता है, तो सेंट्रल कंट्रोल रूम में तत्काल बजर बज उठेगा।
थ्रो-ओवर डिटेक्शन: अक्सर जेलों में बाहर से मोबाइल या नशीले पदार्थ फेंके जाते हैं। एआइ सिस्टम हवा में उड़ती हुई वस्तु को पहचान कर उसकी सटीक लोकेशन बता देगा।
व्यवहार विश्लेषण: ये कैमरे कैदियों के व्यवहार का भी विश्लेषण करेंगे। यदि कहीं भी भीड़ जुटने या संदिग्ध हलचल होने के संकेत मिलते हैं, तो सुरक्षाकर्मियों को दंगा या भागने की योजना का पूर्व अनुमान मिल जाएगा।
नशा और मोबाइल मुक्त होगी जेल
डीआईजी बिरेन साहू ने स्पष्ट किया कि जेल महानिदेशक के कड़े निर्देशों के बाद यह तकनीक लागू की गई है। उन्होंने बताया कि जेलों में ड्रग्स और मोबाइल का अवैध प्रवेश एक पुरानी समस्या रही है, जिसे यह तकनीक पूरी तरह जड़ से खत्म कर देगी। इस हाईटेक अपग्रेड के बाद अब जेल प्रशासन को 24 घंटे स्क्रीन पर नजरें टिकाए रखने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि सिस्टम खुद ही खतरे की पहचान कर अलर्ट जारी कर देगा।




