हार को जीत में बदलने वाली ‘जया एकादशी’, जानें माल्यवान-पुष्पवती की अमर कथा

हिंदू धर्म में हर महीने दो एकादशी आती हैं, लेकिन माघ महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली ‘जया एकादशी’ का अपना ही एक अलग महत्व और रहस्य है। साल 2026 में यह पवित्र दिन 29 जनवरी को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि इसे ‘जया’ क्यों कहा जाता है और इसके पीछे की वह अनोखी कहानी क्या है जो इसे इतना प्रभावशाली बनाती है।
इसका नाम ‘जया’ क्यों पड़ा?
संस्कृत में ‘जया’ का अर्थ होता है ‘विजय’ यानी जीत। पद्म पुराण के अनुसार, यह व्रत करने वाले व्यक्ति को हर तरह के पापों, बुरी शक्तियों और यहाँ तक कि ‘नीच योनि’ (भूत-पिशाच) से मुक्ति मिल जाती है। इस व्रत के प्रभाव से इंसान अपने पुराने बुरे कर्मों पर विजय प्राप्त कर लेता है, इसीलिए इसे ‘जया एकादशी’ के नाम से जाना जाता है।
माल्यवान और पुष्पवती की पौराणिक कथा
इस दिन की सबसे लोकप्रिय कथा स्वर्ग के राजा इंद्र की सभा से जुड़ी है। भविष्य पुराण के अनुसार, स्वर्ग में माल्यवान नाम का एक बहुत ही सुंदर गंधर्व और पुष्पवती नाम की एक मनमोहक अप्सरा रहते थे। दोनों इंद्र देव की सभा में गायन और नृत्य करते थे।
एक बार इंद्र की सभा में प्रस्तुति देते समय दोनों एक-दूसरे की सुंदरता में इतने खो गए कि वे अपने गायन का ताल और सुर भूल गए। उन्हें इस तरह मर्यादा तोड़ते देख इंद्र देव क्रोधित हो गए। उन्होंने दोनों को श्राप दिया कि वे स्वर्ग से निष्कासित होकर पृथ्वी पर पिशाच बनकर रहेंगे।
पिशाच योनि से मुक्ति का चमत्कार
पौराणिक धर्म ग्रंथ के मुताबिक, श्राप के कारण दोनों हिमालय की पहाड़ियों में पिशाच बनकर अत्यंत कष्ट भोगने लगे। उनका जीवन नर्क से भी बदतर हो गया था। संयोग से, माघ महीने की शुक्ल पक्ष की जया एकादशी के दिन वे इतने दुखी और ठंड से बेहाल थे कि उन्होंने पूरे दिन कुछ नहीं खाया और न ही रात को सो सके।
अनजाने में ही सही, उनसे जया एकादशी का व्रत और जागरण हो गया। उनकी इस अनचाही तपस्या से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों को पिशाच योनि से मुक्त कर वापस स्वर्ग भेज दिया। जब वे इंद्र के सामने वापस अपने असली रूप में पहुंचे, तो इंद्र ने हैरानी से पूछा कि उन्हें इस श्राप से मुक्ति कैसे मिली? तब उन्होंने बताया कि यह सब ‘जया एकादशी’ का चमत्कार है।



