Budget 2026: STT बढ़ने से लॉन्ग टर्म में इन शेयरों को हो सकता है नुकसान, कमाई में आएगी गिरावट

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किए गए यूनियन बजट 2026 (Budget 2026) को मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिली हैं। जहां तक शेयर बाजार की बात है, तो बजट में की गई अलग-अलग घोषणाओं का कई सेक्टरों पर बड़ा असर पड़ने की संभावना जताई गई है। मगर एक एलान से लिस्टेड ब्रोकरेज फर्मों को नुकसान हो सकता है और लॉन्ग टर्म में उनके शेयर प्रभावित हो सकते हैं।
महंगी हो जाएगी फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग
बजट 2026 में, सरकार ने डेरिवेटिव्स पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में बढ़ोतरी कर दी। फ्यूचर्स पर STT को 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत और ऑप्शंस प्रीमियम और एक्सरसाइज ऑफ ऑप्शंस पर STT को 0.1 प्रतिशत और 0.125 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.15 प्रतिशत कर दिया। इसका मतलब है कि अब ट्रेडर्स और इन्वेस्टर्स के लिए फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग महंगी हो जाएगी।
इन शेयरों पर पड़ेगा असर
एसटीटी बढ़ाने के फैसले का ब्रोकरेज कंपनियों पर असर पड़ने की संभावना है। दरअसल ब्रोकरेज कंपनियां ब्रोकरेज इनकम, प्लेटफॉर्म फीस और इंटरेस्ट इनकम के लिए F&O एक्टिविटी पर काफी अधिक निर्भर करती हैं। ज्यादा STT से हर ट्रेड पर कुल लागत बढ़ेगी, जिससे ज्यादा और बार-बार ट्रेडिंग करने वाले ट्रेडिंग कम कर सकते हैं।
कम ट्रेडिंग एक्टिविटी का सीधा असर ब्रोकरेज रेवेन्यू और प्रॉफिटेबिलिटी पर पड़ता है। CDSL जैसी डिपॉजिटरी भी इनडायरेक्टली प्रभावित होती हैं। कम ट्रेड और धीमी अकाउंट एक्टिविटी से ट्रांजैक्शन-आधारित इनकम और ग्रोथ की उम्मीदें कम हो सकती हैं। यही वजह है कि ब्रोकरेज और कैपिटल मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर स्टॉक्स में गिरावट आई है।
STT का बढ़ना क्यों है निगेटिव?
पार्टिसिपेशन घटेगा : जब कॉस्ट बढ़ती है, तो ट्रेडर एक्टिविटी कम कर सकते हैं। इससे डेरिवेटिव सेगमेंट में पार्टिसिपेशन घटेगा।
कम लिक्विडिटी : F&O मार्केट से पूरे बाजार को लिक्विडिटी मिलती है। कम वॉल्यूम से लिक्विडिटी घटेगी और बिड-आस्क गैप बढ़ सकता है।
कमाई और ग्रोथ पर दबाव : एक्सचेंज, ब्रोकर और डिपॉजिटरी की ग्रोथ के लिए अधिक वॉल्यूम अहम है। वॉल्यूम में कमी से इनकी कमाई प्रभावित होगी।
मार्केट पर असर : अचानक टैक्स बढ़ने से अनिश्चितता पैदा हुई है। इससे लॉन्ग टर्म में निवेशकों के सेंटीमेटं पर असर पड़ेगा।
ग्लोबल कॉम्पिटिटिवनेस घटेगी : ज्यादा ट्रांजैक्शन टैक्स भारतीय बाजारों को ग्लोबल बाजारों की तुलना में कम आकर्षक बना सकते हैं।




