
एमसीडी का वर्ष 2026-27 का बजट पेश तो फायदे का किया गया, लेकिन पास होते-होते वह घाटे में पहुंच गया। स्थायी समिति की अध्यक्ष सत्या शर्मा की ओर से गत 28 जनवरी को प्रस्तुत किया गया बजट एमसीडी के इतिहास में पहली बार अधिशेष (सरप्लस) का बजट बताया गया था, लेकिन सदन में शुक्रवार को पारित बजट में आय और व्यय के नए आंकड़ों ने इसे घाटे की श्रेणी में पहुंचा दिया।
सत्या शर्मा ने जो प्रारंभिक बजट पेश किया था, उसमें 17,044 करोड़ रुपये की आय और 16,697 करोड़ रुपये के व्यय का लक्ष्य रखा गया था। इस प्रकार बजट में लगभग 347 करोड़ रुपये का अधिशेष प्रस्तावित था। उन्होंने एमसीडी की कमजोर आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए वित्तीय अनुशासन पर विशेष जोर दिया था और ऐसी किसी नई योजना की घोषणा से परहेज किया था, जिससे निगम पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़े। उनका फोकस मौजूदा योजनाओं के विस्तार और संसाधनों के बेहतर उपयोग के माध्यम से नागरिक सुविधाओं को मजबूत करने पर था।
हालांकि, नेता सदन प्रवेश वाही की ओर से शुक्रवार को सदन में पारित बजट में आय और व्यय दोनों के आंकड़ों में वृद्धि की गई। पारित बजट के अनुसार, वर्ष 2026-27 में एमसीडी की अनुमानित आय 17,184 करोड़ रुपये और व्यय 17,583 करोड़ रुपये रखा गया है। इस प्रकार बजट में करीब 399 करोड़ रुपये का घाटा सामने आ रहा है। इस घाटे की भरपाई वर्तमान वित्तीय वर्ष की बचत से होगी।
वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि बजट में कई ऐसी योजनाओं की घोषणा की गई है, जिन्हें पहले एमसीडी की ओर से संचालित किया जाता था और बाद में आर्थिक संकट के कारण बंद कर दिया गया था। इन योजनाओं को फिर से शुरू करने या विस्तार देने से निगम पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ेगा। इनमें नागरिक सुविधाओं से जुड़ी विभिन्न लोकलुभावनी पहल शामिल हैं, जिनका उद्देश्य आम लोगों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाना है।
दिलचस्प बात है कि इनमें से कई योजनाएं दिल्ली सरकार भी संचालित कर रही हैं। पहले ऐसी स्थिति बन गई थी कि नागरिकों को समान प्रकार की सुविधाएं दो अलग-अलग एजेंसियों से मिल रही थीं। इसी कारण दिल्ली सरकार ने वित्तीय संकट से जूझ रही एमसीडी की कई योजनाएं बंद करा दी थीं, ताकि खर्चों पर नियंत्रण रखा जा सके। अब इन योजनाओं को पुनः शुरू करने का निर्णय निगम की वित्तीय स्थिति पर फिर से दबाव बना सकता है।
वित्तीय अनुशासन और लोकलुभावन घोषणाओं के बीच संतुलन बनाना एमसीडी के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। जहां स्थायी समिति ने अधिशेष बजट के माध्यम से वित्तीय सुधार का संकेत देने की कोशिश की थी, वहीं अंतिम बजट में बढ़े हुए व्यय ने उस प्रयास को कमजोर कर दिया है। निगम के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह अपने राजस्व स्रोतों को मजबूत करे और खर्चों को नियंत्रित रखते हुए नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता बनाए रखे।




