भारत के 4 आम जिनके दीवाने 35 करोड़ अमेरिकन, एडवांस बुकिंग और मुंह मांगी कीमत देने को तैयार

भारत में आम का सीजन (Mango Season) आ चुका है और बाजारों में आम की अलग-अलग किस्में देखने को मिल रही है। फ्रूट मार्केट से लेकर हाट बाजार में तोतापरी, चौसा, लंगड़ा से लेकर केसर जैसी वैरायटी के आम बिक रहे हैं। खास बात है कि देश के साथ-साथ विदेशों में भी भारतीय आम (Indian Mangoes) की मांग बढ़ रही है। खासकर, अमेरिका में तो इंडियन मैंगो को लेकर जबरदस्त क्रेज है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल के महीने में पहली खेप अमेरिका पहुंचने पर प्री-ऑर्डर में खत्म हो गई।
डिमांड इतनी है कि 10-12 आम के एक बॉक्स के लिए लोग 5500 रुपये देने तक तैयार हैं। हैरान करने वाली बात है कि पिछले साल यही मैंगो बॉक्स 3700 से 4200 रुपये में मिल रहे थे। ऐसे में पिछले साल की तुलना में अमेरिका में भारतीय आम की कीमतें 30 फीसदी से ज्यादा बढ़ गई हैं।
क्यों बढ़े अमेरिका में आम के दाम?
अमेरिका में आम के दाम बढ़ने की मुख्य वजह ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें बढ़ना और इससे शिपमेंट का महंगा होना है। दरअसल, शिपमेंट लेट होने और कैंसिल होने से सप्लाई प्रभावित हुई और खर्च भी बढ़ा है।
भारतीय आम के दीवाने क्यों हैं अमेरिकन?
अमेरिका के ग्रॉसरी स्टोर में मैक्सिकन, मैंगो सालभर मिलते हैं लेकिन अमेरिकन, भारतीय आम की मिठास को ज्यादा पसंद करते हैं। अमेरिका में महाराष्ट्र का हापुस (अल्फांसो), गुजरात का केसर, उत्तर भारत का चौसा और लंगड़ा व साउथ इंडिया के बंगनपल्ली आम को सबसे ज्यादा पसंद किया जा रहा है।
अमेरिका में आम की दीवानगी इस कदर है कि कुछ कंपनियां पूरे सीजन के लिए सब्सक्रिप्शन आधारित ‘मैंगो पास’ बेच रही हैं, जिसकी कीमत 1000 डॉलर (करीब 83,000 रुपये) तक है। इसके तहत सब्सक्रिप्शन लेने वाले कस्टमर्स को पूरे सीजन में हर हफ्ते आम की गारंटीड डिलीवरी दी जाती है।
सालों तक लगा रहा था प्रतिबंध
भारत के आम की पूरी दुनिया दीवानी है इसलिए हिंदुस्तान, दुनिया में होने वाली मैंगो सप्लाई में आधे से ज्यादा आपूर्ति करता है। आपको जानकार हैरानी होगी कि अमेरिका में दशकों तक भारतीय आम पर प्रतिबंध लगा हुआ था।
इसकी वजह कृषि और पर्यावरण से जुड़ी थी क्योंकि अमेरिका को डर था कि भारतीय आमों के साथ कुछ ऐसी बीमारियाँ और कीड़े उनके देश में आ सकते हैं, जो उनकी अपनी खेती को तबाह कर सकते हैं। साल 2007 में राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और पीएम मनमोहन सिंह के बीच समझौते के बाद ही, रेडिएशन तकनीक के इस्तेमाल की कड़ी शर्त पर यह बैन हटा था।




