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सोना, पेट्रोल और विदेश यात्रा.. ये कैसे पहुंचाते हैं विदेशी मुद्रा भंडार को नुकसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने 10 मई को देशवासियों से 3 खास अपील की। इनमें एक साल तक सोने की खरीदी टालने (Gold Buying), गैर जरूरी विदेश यात्राएं (Foreign travel) ना करने और पेट्रोल-डीजल (Petrol-Diesel) की बचत के लिए वर्क फ्रॉम होम शुरू करने और कार पूलिंग व पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की सलाह शामिल है। पीएम मोदी ने यह अपील, पश्चिम एशिया में जारी संकट और उसके चलते कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों व सप्लाई चेन के प्रभावित होने के मद्देनजर की है।

दरअसल, भारत अपनी जरुरत का 80 फीसदी कच्चा तेल (Crude Import) आयात करता है और जब भी तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो देश का आयात बिल बढ़ जाता है, क्योंकि क्रूड के इंपोर्ट के लिए भुगतान डॉलर में होता है। चूंकि, जियोपॉलिटिकल तनाव के चलते डॉलर मजबूत हो रहा है इसलिए देश के विदेशी मुद्रा भंडार (Indias Forex Reserve) पर इसका बड़ा असर देखने को मिल रहा है। कच्चे तेल की तरह यही थ्योरी, गोल्ड पर भी लागू होती है क्योंकि भारत में बड़ी मात्रा में हर साल सोने का आयात किया जाता है।

पीएम मोदी की अपील और उसके मायने
क्या आप जानते हैं एक विदेश यात्रा पर (चाहे यूरोप की हो या अमेरिका व अन्य एशियाई देशों की) औसतन भारतीयों का कितना पैसा खर्च होता है, अगर भारतीय एक साल तक सोना की खरीदारी नहीं करें या भारतीय बाजारों में गोल्ड की डिमांड कम रहने से कीमतों पर क्या असर होगा? इसके अलावा, अगर पेट्रोल-डीजल की बचत के लिए, लोग वर्क फ्रॉम होम, कार पुलिंग या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें तो विदेशी मुद्रा भंडार को कितनी राहत मिल सकती है? आइये इन तीनों सवालों के जवाब आंकड़ों व एक्सपर्ट्स से समझने की कोशिश करते हैं।

सोना कैसे डालता विदेशी मुद्रा भंडार पर असर?
पेट्रोल की तरह सोने के लिए भी भारत, अन्य देशों पर निर्भर है और हर साल भारी मात्रा में गोल्ड इंपोर्ट करता है। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोने का खरीदार है। पिछले वर्ष, भारत ने अकेले सोने पर लगभग 72 अरब डॉलर खर्च किए – यानी लगभग 6 अरब डॉलर प्रति माह। दरअसल, आयातित सोने की उपभोक्ता मांग सीधे तौर पर अर्थव्यवस्था से डॉलर के आउटफ्लो को बढ़ाती है। इसलिए, बड़े पैमाने पर सोने का आयात भारत के चालू खाता घाटे पर दबाव डालता है और डॉलर की मांग बढ़ाता है। डॉलर के प्रचलन में आने से भारतीय रुपया कमजोर होता है, जिससे सोना और भी महंगा हो जाता है।

केडिया एडवाइजरी की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गैर-जरूरी सोने की खरीद से बचने की हालिया अपील, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आयात बिलों में वृद्धि के बीच भारत के बाह्य क्षेत्र की स्थिरता को लेकर बढ़ती चिंताओं से प्रेरित प्रतीत होती है। पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय रुपया 2021 में लगभग 74-75 रुपये प्रति अमेरिकी डॉलर से गिरकर 2026 में 95 रुपये से नीचे आ गया है, जो इसके मूल्य में लगभग 27-28% की गिरावट को दर्शाता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, मध्य पूर्व में तनाव और आयात से डॉलर के बहिर्वाह में वृद्धि, विशेष रूप से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति मार्गों को लेकर नए सिरे से अनिश्चितता के बाद, इस दबाव को और बढ़ा दिया है।

कमोडिटी फर्म, केडिया एडवाइजरी के फाउंडर, अजय केडिया ने कहा, “भारत कच्चे तेल, खाद्य तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और उर्वरकों के आयात पर काफी हद तक निर्भर है, जो आर्थिक विकास और घरेलू खपत के लिए बेहद जरूरी हैं। हालांकि, सोने का आयात मुख्य रूप से निवेश, आभूषण और फैशन की मांग से जुड़ा है इसलिए गोल्ड की खरीदी को टाला जा सकता है और क्योंकि यह रोजमर्रा की जरुरत का हिस्सा नहीं है।”

भारत हर साल बड़ी मात्रा में सोने का आयात करता है, 2021 में आयात 1,067 टन से अधिक रहा, जबकि सबसे कम आयात वाले वर्ष में भी आयात 430 टन से अधिक था। दीर्घकालिक वार्षिक औसत लगभग 800 टन के आसपास बना हुआ है, जिससे विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह और चालू खाता संतुलन पर काफी दबाव पड़ता है।

यह चिंता ऐसे समय में और भी मायने रखती जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, 6 मार्च 2026 को जारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 728.49 अरब डॉलर तक पहुंचने के बाद, आयात लागत में वृद्धि और मुद्रा दबाव के कारण अस्थिरता दिखाते हुए 690.69 अरब डॉलर के करीब आ गया है। कमजोर रुपया सीधे तौर पर आयात की घरेलू लागत को बढ़ाता है, विशेष रूप से कच्चे तेल और सोने की, जिससे बाहरी जोखिम बढ़ जाते हैं।

नहीं खरीदा एक साल तक गोल्ड, तो क्या होगा?
FY26 में भारत का कुल आयात बिल: $775 बिलियन
इनमें 4 कमोडिटी की कुल लागत : $240+ बिलियन
क्रूड ऑयल: $134.7 बिलियन
गोल्ड: $72 बिलियन
खाने का तेल: $19.5 बिलियन
फर्टिलाइजर्स: $14.5 बिलियन

ये चार वस्तुएं भारत के कुल आयात का 31.1 प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन इनमें अकेले सोने का आयात कुल इंपोर्ट का करीब 10 प्रतिशत है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से इन वस्तुओं का उपयोग कम करने का आग्रह किया है।

यदि भारतीय एक वर्ष के लिए सोने की खरीद में कमी लाते हैं तो गोल्ड इंपोर्ट में 30-40% की गिरावट से भी 20-25 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। 50% की गिरावट से 36 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। खास बात है कि यह अनुमानित चालू खाता संख्या का लगभग आधा है। एक वर्ष तक सोना न खरीदने से भारत से डॉलर का आउटफ्लो सीधे तौर पर अरबों डॉलर तक कम हो सकता है।

पेट्रोल पर कैसे बचेगा सरकार का पैसा?
भारत, वर्तमान में अपनी जरुरत का 89% तेल आयात करता है। सोने की कीमतों के साथ तेल की कीमतों में वृद्धि (पिछले एक वर्ष में लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 113 डॉलर तक) सीधे तौर पर डॉलर के आउटफ्लो को बढ़ाती है। चूंकि, FY26 में भारत ने क्रूड ऑयल के आयात पर $134.7 बिलियन खर्च किए थे और अगर कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो यह आंकड़ा तेजी से बढ़ेगा और भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बुरा असर डालेगा।

इंडिपेंडेंट कमोडिटी एक्सपर्ट अनुज गुप्ता ने कहा, अगर देश में पेट्रोल-डीजल की डिमांड कम हुई तो खपत कम होगी और सरकार पर ज्यादा क्रूड इंपोर्ट करने का दबाव नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार लगातार पेट्रोलियम प्रोडक्ट पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को प्रमोट कर रही है, और आने वाले दिनों में लोग तेजी से ई-व्हीकल की ओर शिफ्ट हो सकते हैं, सरकारी खजाने और पर्यावरण की सुरक्षा, दोनों के लिहाज से अच्छा होगा।

अब विदेशी मुद्रा भंडार का गणित समझें
ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 690.69 अरब डॉलर है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि फरवरी में भंडार बढ़कर लगभग 728 अरब डॉलर हो गया था, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने के कारण अप्रैल में यह घटकर लगभग 691 अरब डॉलर रह गया।
वहीं दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने अनुमान लगाया है कि भारत का चालू खाता घाटा (CA) 2026 में बढ़कर 84.5 अरब डॉलर हो सकता है, जो जीडीपी का लगभग 2 प्रतिशत है। चालू खाते में वृद्धि का सीधा सा मतलब है- आने वाले डॉलरों की तुलना में जाने वाले डॉलरों की संख्या अधिक होगी।

विदेश यात्राओं पर होने वाला औसत खर्च
टूर एंड ट्रैवल एजेंसी SOTC की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय टूरिस्ट के लिए 2026 में एक सप्ताह की फॉरेन ट्रिप का औसत खर्च आम तौर पर ₹50,000 से ₹1.5 लाख प्रति व्यक्ति के बीच रहता है।

हालांकि, यह खर्च दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के लिए ₹2 लाख से अधिक हो सकता है, जबकि यूरोप या अमेरिका के लिए यह कॉस्ट ₹2 लाख से अधिक हो सकती है। चूंकि, डॉलर की कीमत बढ़ रहती है और रुपया कमजोर हो रहा है, ऐसे में विदेश यात्रा और विदेश में पढ़ाई करना, दोनों महंगा हो जाता है इसलिए इन पैकेज और विदेश में अन्य खर्च बढ़ सकते हैं।

वहीं, true yatri की रिपोर्ट के अनुसार, भारत से बजट वाली यूरोप ट्रिप (7 दिन का खर्च) ₹80,000 – ₹1,30,000 प्रति व्यक्ति आता है।
10 दिन के लिए यह खर्च ₹1,50,000 – ₹2,50,000 प्रति व्यक्ति होगा।
जबकि, लक्जरी ट्रिप (10-15 दिन) के लिए यह बजट ₹3,00,000 – ₹6,00,000+ प्रति व्यक्ति तक जा सकता है।

फ्लाइट फेयर
दिल्ली/मुंबई – लंदन, पेरिस या फ्रैंकफर्ट: ₹25,000 – ₹65,000
दिल्ली/मुंबई – एम्स्टर्डम या रोम: ₹40,000 – ₹70,000
चेन्नई/बेंगलुरु – यूरोप: ₹45,000 – ₹75,000

फ्लाइट फेयर, वीजा फीस और होटल फेयर व अन्य खर्चों को मिलाकर ट्रैवल एजेंसी फॉरेन ट्रिप प्लान तैयार करती हैं, जिनकी कीमत 50 हजार से 3 लाख रुपये प्रति व्यक्ति तक जा सकती है। इसमें यूरोप, अमेरिका व अन्य एशियाई देशों की यात्रा शामिल है।

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