बच्चों के स्पीच डिले पर डॉक्टर ने दी चेतावनी, माता-पिता न करें ये भूल

घर में बच्चे की पहली बोली सुनने का इंतजार हर माता-पिता को होता है, लेकिन कई बार यह सब्र थोड़ा लंबा हो जाता है। अक्सर परिवार के लोग कह देते हैं, “चिंता मत करो, बड़ा होगा तो अपने आप बोलने लगेगा।”
मगर, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, द्वारका के ईएनटी और कॉक्लियर इम्प्लांट सर्जरी के डायरेक्टर, डॉ. सुमित मृग का नजरिया इससे अलग है। उनका मानना है कि अगर बच्चा बोलने में लगातार देरी कर रहा है, तो इसे महज उम्र का तकाजा मानकर नजरअंदाज करना एक गलती हो सकती है।
आइए जानते हैं कि बच्चों के विकास के सही पैमाने क्या हैं और माता-पिता को कब सतर्क हो जाना चाहिए।
सही उम्र और बातचीत के पड़ाव
हर बच्चे के सीखने और बढ़ने की गति अलग होती है, लेकिन कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखना जरूरी है:
पहला साल: एक साल का होते-होते बच्चे को अपना नाम सुनकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए। उसे छोटी-छोटी बातें समझनी चाहिए और कुछ अर्थपूर्ण शब्द भी बोलने चाहिए।
दूसरा साल: दो साल की उम्र तक आते-आते बच्चे के पास कम से कम 50 शब्दों की शब्दावली होनी चाहिए और वह दो शब्दों को मिलाकर छोटे वाक्य बनाने लायक हो जाना चाहिए।
अगर आपका बच्चा इन पैमानों पर खरा नहीं उतर रहा है या उसे आपकी बातें समझने में उलझन हो रही है, तो पेशेवर जांच करवाना जरूरी हो जाता है।
आखिर बच्चा चुप क्यों है?
बच्चे के देर से बोलने के पीछे कई कारण छिपे हो सकते हैं। एक सबसे बड़ा कारण, जिसे अक्सर लोग पकड़ नहीं पाते, वह है- सुनने में परेशानी।
इसके अलावा, कुछ अन्य कारण भी हो सकते हैं, जैसे:
भाषा के विकास में रुकावट
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर
बौद्धिक विकलांगता
न्यूरोलॉजिकल समस्याएं
या फिर घर में बच्चे के साथ पर्याप्त बातचीत का माहौल न होना।
बीमारी की सही जड़ का पता चलने पर ही यह तय होता है कि बच्चे का इलाज किस दिशा में जाएगा।
‘लेट टॉकर’ और बीमारी में क्या अंतर है?
हर कम बोलने वाला बच्चा बीमार नहीं होता। डॉक्टरों के मुताबिक, इन दोनों स्थितियों में एक बड़ा फर्क है:
लेट टॉकर: 18 से 30 महीने के बीच के कुछ बच्चे बोलने में समय लेते हैं, लेकिन वे आपकी बातें पूरी तरह समझते हैं। वे अच्छे से आई-कॉन्टैक्ट बनाते हैं, इशारे करते हैं और लोगों से घुलते-मिलते हैं। ऐसे ज्यादातर बच्चे समय के साथ दूसरों के बराबर आ जाते हैं, हालांकि कुछ को आगे चलकर थोड़ी बहुत परेशानी हो सकती है।
स्पीच और लैंग्वेज डिसऑर्डर: यह समस्या जल्दी खत्म नहीं होती। ‘स्पीच डिसऑर्डर’ में बच्चे को शब्दों का सही उच्चारण करने में दिक्कत होती है। वहीं, ‘लैंग्वेज डिसऑर्डर’ में बच्चे को दूसरों की बात समझने और अपने विचार व्यक्त करने में संघर्ष करना पड़ता है।
इन ‘चेतावनी के संकेतों’ को पहचानें
अगर आपके बच्चे में देर से बोलने के साथ-साथ ये लक्षण भी दिख रहे हैं, तो तुरंत मेडिकल मदद लें:
बात करते समय नजरें न मिलाना।
आवाज देने पर ध्यान न देना।
हाथ हिलाकर बाय-बाय करना या उंगली से इशारा करना बंद कर देना।
दूसरों के साथ घुलने-मिलने से कतराना।
पहले से सीखे हुए शब्द या सामाजिक कौशल भूल जाना।
‘इंतजार’ छोड़ें, कदम बढ़ाएं
जीवन के शुरुआती कुछ साल बच्चे के दिमागी विकास के लिए सबसे अहम होते हैं। इसलिए, बच्चे के बोलने का इंतजार करने वाली “वेट एंड वॉच” की नीति छोड़ें।
अगर मन में कोई भी शंका है, तो तुरंत किसी हेल्थकेयर प्रोफेशनल या स्पीच-लैंग्वेज पैथोलॉजिस्ट से मिलें। जांच के दौरान बच्चे की सुनने की क्षमता और मानसिक विकास का आंकलन किया जाता है। इलाज के तौर पर स्पीच थेरेपी दी जा सकती है, और माता-पिता को ऐसे तरीके सिखाए जाते हैं जिससे वे घर में ही बच्चे को बोलने के लिए प्रेरित कर सकें।




