‘धीमे जहर’ वाली कीटनाशक दवाइयों के खिलाफ सिस्टम से जंग, मुद्दा बड़ा पर कहानी बेदम

यह आम धारणा है कि फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धो लेने से उन पर लगे कीटनाशक पूरी तरह साफ हो जाते हैं, जबकि हकीकत इससे काफी अलग है। इसी विषय को केंद्र में रखकर बनी फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोसेस’ कीटनाशकों के इस्तेमाल, उन्हें बनाने वाली कंपनियों, उनके संभावित दुष्प्रभावों और सरकारी व्यवस्था पर सवाल उठाती है।
यह विषय बेहद गंभीर और जागरूकता बढ़ाने वाला है, लेकिन अगर इसका प्रस्तुतिकरण अधिक प्रभावशाली और गहराई से होता, तो यह फिल्म कहीं ज्यादा असर छोड़ सकती थी।
क्या है ‘द इंडिया स्टोरी’ की कहानी?
कहानी पुणे की पृष्ठभूमि में सेट है। पूर्व सैन्य कर्मी योगेश पाटिल (श्रेयस तलपड़े) अपनी सात वर्षीय बेटी परी (त्रिशा शारदा) की मौत के बाद न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। हाई कोर्ट में उसकी पैरवी वकील अर्चना (काजल अग्रवाल) करती है। परी की मौत ब्लड कैंसर से होती है, लेकिन अर्चना इसे हत्या करार देती है। वह इसके लिए सरकार, कीटनाशक बनाने वाली कंपनियों और किसानों को बेचे जाने वाले उनके कीटनाशक को जिम्मेदार ठहराती है।
इसके बाद अदालत में लंबी कानूनी बहस आरंभ होती है। वहां से योगेश के जीवन की परतें खुलती हैं। अर्चना उसकी पत्नी है और परी दोनों की इकलौती बेटी थी। फ्लैशबैक में दिखाया जाता है कि जब परी को ब्लड कैंसर होने का पता चलता है, तो योगेश उसकी देखभाल के लिए नौकरी छोड़ देता है। बेटी के इलाज में वह अपना घर तक बेच देता है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद परी को बचा नहीं पाता। अदालती सुनवाई के दौरान कहानी पंजाब, केरल जैसे देश के अलग-अलग हिस्सों में भी जाती है। इस दौरान कैंसर ट्रेन का जिक्र आता है।
यह ट्रेन पंजाब के बठिंडा से बड़ी संख्या में कैंसर मरीजों को राजस्थान के बीकानेर स्थित अस्पताल तक ले जाने के कारण चर्चित हुई थी। बीकानेर के सरकारी कैंसर अस्पताल में अपेक्षाकृत कम खर्च में इलाज उपलब्ध होने की वजह से वर्षों तक मरीज इस ट्रेन से यात्रा करते रहे। फिल्म में केरल के कासरगोड में कीटनाशकों से जुड़ी त्रासदी का भी उल्लेख है। इतने मजबूत वास्तविक संदर्भ होने के बाद भी फिल्म इन्हें अपनी मुख्य कहानी में सहज और प्रभावशाली ढंग से पिरो नहीं पाती।
तितर-बितर है प्रेजेंट से पास्ट में जाती कहानी
सच्ची घटना से प्रेरित सागर बी शिंदे की लिखी कहानी का विषय बहुत अहम, प्रासंगिक और समसामयिक है। फिल्म बताती है कि हरित क्रांति के बाद फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल किस तरह तेजी से बढ़ा। वह कैंसर के महंगे इलाज, दवाइयों की बढ़ती कीमतों और अस्पतालों की चुनौतियों जैसे मुद्दों को समुचित तरीके से रेखांकित करते हैं। फिल्म दूध में मिलावट के पीछे की सच्चाई को भी दर्शाया गया है।
हालांकि, कमजोर पटकथा की वजह से निर्देशक चेतन डीके इस संवेदनशील मुद्दे को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारने में चूक जाते हैं। वर्तमान से अतीत में आती-जाती कहानी बिखरी हुई है। कई प्रसंग सवाल भी खड़े करते हैं। उदाहरण के लिए योगेश सेना में कार्यरत होता है। ऐसे में उसका सेना के अस्पताल का सहारा न लेना और नौकरी छोड़ देना पूरी तरह विश्वसनीय नहीं लगता।
यदि योगेश का किरदार एक आम नागरिक का होता, तो यह संघर्ष कहीं अधिक प्रभावी बन सकता था। फिल्म कैंसरग्रस्त मरीजों की व्यथा दिखाती है, बेहतर होता किसी की कहानी को भी थोड़ा उकेरती। उनकी तकलीफों के बारे में भी बात करती। तब उनका भावनात्मक असर गहरा होता। कोर्टरूम ड्रामा की बहस और दलीलें भी प्रभावी नहीं बन पाई है।
निर्देशक ने मीडिया, किसानों के विरोध, कीटनाशक कंपनियों और सरकार की प्रतिक्रिया जैसे अहम पहलुओं को सतही ढंग से पेश किया है। वहीं योगेश और परी के बीते खुशनुमा पलों को दिखाने वाले फ्लैशबैक पुराने ढर्रे का लगते है, लेकिन परी की बीमारी और उसके कैंसर के इलाज को संवेदनशील तरीके से दर्शाया गया है।
काजल अग्रवाल और श्रेयस नहीं छोड़ पाए प्रभाव
कलाकारों में काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपड़े का अभिनय बहुत प्रभावित नहीं करता है। बाल कलाकार त्रिशा शारदा का अभिनय शानदार है। संक्षिप्त भूमिका में मुरली शर्मा जरूर प्रभावित करते हैं। जज की भूमिका में अतुल तिवारी और वकील की भूमिका में मनीष वाधवा कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं।
कुल मिलाकर द इंडिया स्टोरी: स्लो पॉइजन इन प्रोसेस कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल और उसके संभावित दुष्प्रभाव जैसे गंभीर मुद्दे पर जरूरी बहस छेड़ती है। फिल्म अंत में जैविक खेती को बढ़ावा देने का संदेश भी देती है। हालांकि, कमजोर पटकथा और प्रभावहीन प्रस्तुति के कारण यह अपने महत्वपूर्ण विषय के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाती।




