‘मिनी स्ट्रोक’ को इग्नोर करना पड़ सकता है भारी!

स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें समय पर इलाज मिलना बहुत जरूरी है। यह एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल कंडिशन है, जो विकलांगता और मौत का भी कारण बन सकती है। इसलिए स्ट्रोक को समय पर पहतानना और बचाव करना बेहद जरूरी है।
स्ट्रोक से बचाव में तो तरह के प्रिवेंशन शामिल होते हैं। पहला प्राइमरी प्रिवेंशन और दूसरा सेकेंडरी प्रिवेंशन। इन दोनों तरीकों के बारे में जानकर स्ट्रोक के खतरे को कम करने में काफी मदद मिल सकती है।
प्राइमरी प्रिवेंशन
इसका मतलब होता है पहली बार स्ट्रोक आने से रोकना, यानी लाइफस्टाइल में बदलाव करके स्ट्रोक के रिस्क को कम करना। इसमें स्ट्रेस मैनेजमेंट, प्रदूषण के संपर्क में कम आना, अच्छी और पूरी नींद लेना, नियमित रूप से एक्सरसाइज करना और स्मोकिंग छोड़ना शामिल हैं। साथ ही, ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर कंट्रोल करना भी उतना ही जरूरी है।
सेकेंडरी प्रिवेंशन
सेकेंडरी प्रिवेंशन उन लोगों के लिए बेहद जरूरी है, जिन्हें पहले स्ट्रोक या टीआईए (Transient Ischaemic Attack) आ चुका है। टीआईए को मिनी स्ट्रोक भी कहा जाता है और ये तब होता है, जब दिमाग के किसी हिस्से में ब्लड फ्लो रुक जाता है, जिसके कारण स्ट्रोक के लक्षण दिखाई देते हैं और फिर ठीक हो जाते हैं। हालांकि, ये भविष्य में आने वाले किसी बड़े स्ट्रोक की चेतावनी हो सकता है। इसलिए दोबारा स्ट्रोक से बचने के लिए मरीजों को डॉक्टर की सलाह से अपनी दवाएं लेनी चाहिए।
डॉक्टर्स एंटीप्लेटलेट या एंटीकोआगुलेंट दवाइयां दे सकते हैं, कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं, हाई बीपी और डायबिटीज कंट्रोल करने वाली दवाएं भी दे सकते हैं। साथ ही, कुछ मरीजों को डॉक्टर की सलाह के मुताबिक विटामिन सप्लीमेंट्स की भी जरूरत पड़ सकती है।
ब्लड थिनर्स और दिल से जुड़ी सावधानियां
कुछ बुजुर्गों में एट्रियल फाइब्रिलेशन या दिल से जुड़ी दूसरी समस्याएं पाई जाती हैं। इसके कारण दिल में खून के थक्के बन सकते हैं। ऐसे मरीजों को स्ट्रॉन्ग ब्लड थिनर्स की जरूरत पड़ सकती है। कई बार मरीज ये नहीं जानते कि इन दवाओं को लगातार लेते रहना उनके लिए कितना जरूरी है और वे अक्सर डॉक्टर की दवाएं लेना बंद कर देते हैं, जो खतरनाक साबित हो सकता है।
गर्दन की आर्टरीज की जांच
दिमाग तक खून पहुंचाने वाली गर्दन की आर्टरीज में रुकावट का पता कैरोटिड डॉपलर अल्ट्रासाउंड के जरिए लगाया जा सकता है। ये एक नॉन इंवेसिव टेस्ट है, जिसमें गर्दन की आर्टरी में रुकावट या सिकुड़न का पता लगाने के लिए साउंड वेव्स का इस्तेमाल किया जाता है। टेस्ट रिजल्ट के हिसाब से डॉक्टर मरीज को दवाएं या स्टेंटिंग जैसी प्रक्रिया की सलाह दे सकते हैं।




